अब्राहमिक आस्था प्रणाली के भारत और भारतीय मूल्यों पर पड़ते दुष्प्रभाव ' विषय पर विद्वानों ने रखे विचार।
Friday, May 8, 2026
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इंदौर डेस्क
भारतीय संस्कृति एवं विचार किसी मत को थोपने के बजाय स्वीकार करने और समन्वय पर आधारित है। समय समय पर इस पर चर्चाएं भी होती रहती है।
हाल ही में आयोजित एक वैचारिक संगोष्ठी में देश के प्रतिष्ठित विद्वानों और विचारकों ने "अब्राहमिक आस्था प्रणाली के भारत और भारतीय मूल्यों पर प्रभाव" विषय पर अपनी अंतर्दृष्टि साझा की।
वक्ताओं ने भारतीय संस्कृति की समावेशी प्रकृति और अब्राहमिक पंथों की विशिष्ट अवधारणाओं के बीच के अंतर को रेखांकित किया।
भारतीय समाज संवाद व सहअस्तित्व पर आधारित : श्री नंद कुमार जी
विषय पर प्रकाश डालते हुए नन्द कुमार ने कहा कि - भारतीय सभ्यता का मूल स्वभाव समावेश, संवाद और सह-अस्तित्व पर आधारित रहा है। यहाँ समाज को “हम और वे” के कठोर द्वैत में नहीं बाँटा गया, बल्कि विविधता और बहुलता को स्वीकार किया गया। इसके विपरीत, अब्राहमिक आस्था प्रणालियों में “believer” और “non-believer” जैसी अवधारणाएँ दिखाई देती हैं, जहाँ सत्य को अंतिम और एकमात्र रूप में स्थापित करने का आग्रह होता है। भारतीय चिंतन “एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति” के माध्यम से सत्य के अनेक आयामों को स्वीकार करता है।
आचार्य विनोबा भावे ने “सर्वधर्म समभाव” के माध्यम से भारतीय संस्कृति के इसी मूल तत्व को स्पष्ट किया। उनके अनुसार धर्म संघर्ष नहीं, बल्कि प्रेम, करुणा, भाईचारे और शांति का माध्यम है।
उन्होंने कहा कि - भारतीय दृष्टि किसी एक मत को अंतिम मानकर अन्य को अस्वीकार नहीं करती, बल्कि सभी साधना-पद्धतियों में एक ही सार्वभौमिक सत्य की अनुभूति देखती है।
भारतीय दर्शन में कला, ज्ञान और संस्कृति का उद्देश्य केवल भोग नहीं, बल्कि आत्मोन्नति और लोककल्याण है।हमारे लिए कला अर्थात “सा कला या विमुक्तये” इसी भावना को व्यक्त करता है। भारतीय चिंतन जीवन को गतिशील मानता है, इसलिए यहाँ “युगधर्म” और “आपद्धर्म” जैसी अवधारणाएँ विकसित हुईं, जो समय और परिस्थिति के अनुसार आचरण का मार्ग निर्धारित करती हैं।
भारतीय संस्कृति में स्त्री और पुरुष को प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि पूरक माना गया है। यहाँ समाज “सह-अस्तित्व” और संतुलन के आधार पर चलता है। भारत की आत्मा संघर्ष में नहीं, बल्कि समन्वय में विश्वास करती है। विविधताओं को स्वीकार कर उन्हें एक व्यापक सांस्कृतिक चेतना में जोड़ना ही भारत की वास्तविक शक्ति और उसकी सनातन पहचान है।
भारतीय चिंतन ने सत्य को किसी एक विचार, मत या पंथ तक सीमित नहीं माना: अम्बरीष सिंह जी
विषय को आगे बढ़ाते हुए अम्बरीष ने बताया कि - भारत की सांस्कृतिक दृष्टि सदैव समावेशी और व्यापक रही है। यहाँ “मैं ही सही” नहीं, बल्कि “मैं भी सही” की अवधारणा विकसित हुई। भारतीय चिंतन ने सत्य को किसी एक विचार, मत या पंथ तक सीमित नहीं माना, बल्कि विविध दृष्टियों में उसकी अभिव्यक्ति को स्वीकार किया। यही कारण है कि भारत हजारों वर्षों से अनेक भाषाओं, परंपराओं और जीवन-पद्धतियों को साथ लेकर चलने वाली अद्वितीय सभ्यता रहा है।
उन्होंने इतिहास का उदाहरण देते हुए बताया कि - इतिहास में अनेक आक्रमणों और संघर्षों के कारण भारत को निरंतर आत्मरक्षा करनी पड़ी। इस प्रक्रिया में कहीं न कहीं समाज अपने मूल स्वभाव और आत्मबोध से दूर होता गया। आत्महीनता और खंडित चिंतन की प्रवृत्ति बढ़ी, जबकि भारतीय दर्शन सदैव समग्रता, सामूहिकता और संतुलन की बात करता है।
भारतीय संस्कृति मूलतः उपभोगवादी नहीं रही। यहाँ विकास का अर्थ सम्पूर्ण सृष्टि के साथ संतुलित और सामंजस्यपूर्ण उन्नति था। “ईशावास्यमिदं सर्वम्”, “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” जैसे विचार इसी चेतना को प्रकट करते हैं। भारतीय जीवनदृष्टि में प्रकृति, जीव-जगत और समस्त सृष्टि पूजनीय मानी गई है।
कुंभ मेला , सिंहस्थ , अमरनाथ यात्रा और छठ पूजा जैसे आयोजन भारतीय समाज की सामूहिकता और सामाजिक समरसता के जीवंत उदाहरण हैं, जहाँ लोग बिना भेदभाव के एक साथ जुड़ते हैं।
समय के साथ पश्चिमी उपभोक्तावाद और बाजारवादी सोच ने हमारे सामाजिक जीवन को प्रभावित किया। विवाह जैसे संस्कार, जिन्हें भारतीय परंपरा पवित्र और स्थायी बंधन मानती थी, धीरे-धीरे औपचारिकता तक सीमित होते दिखाई देने लगे। आवश्यकता इस बात की है कि हम बिना किसी की भावनाओं को आहत किए, परिवर्तनों का विवेकपूर्ण विश्लेषण करें।
आज चुनौती केवल बाहरी प्रभावों की नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से दूर होने की भी है। जिस संस्कृति और सभ्यता ने हमें हजारों वर्षों तक संरक्षित रखा, हम उसी को धीरे-धीरे विस्मृत करते जा रहे हैं। यह समय विभाजन का नहीं, बल्कि आत्ममंथन और पुनर्स्मरण का है। भारत की शक्ति उसकी समग्रता, सह-अस्तित्व और आध्यात्मिक दृष्टि में निहित है। यदि हम अपने मूल स्वभाव को पुनः पहचान सकें, तो भारत विश्व को संतुलित और मानवीय जीवनदृष्टि प्रदान कर सकता है।
भारत की संस्कृति आग्रह नहीं, बल्कि स्वीकार और समन्वय की संस्कृति है: एडवोकेट मोनिका अरोड़ा जी
एडवोकेट मोनिका अरोड़ा ने चर्चा करते हुए कहा कि - भारत केवल एक भौगोलिक पहचान नहीं, बल्कि एक गहन सांस्कृतिक और दार्शनिक चेतना का प्रतीक है। भारतीय परंपरा में “भा” का अर्थ प्रकाश और “रत” का अर्थ उस प्रकाश में रत होना माना गया है। अर्थात भारत वह भूमि है, जहाँ जीवन ज्ञान, चेतना और सत्य के प्रकाश में जीने का प्रयास करता है। इसी कारण भारतीय सभ्यता ने बाहरी भिन्नताओं से अधिक आंतरिक एकता और आत्मिक समरसता को महत्व दिया।
विश्व की अनेक आस्था प्रणालियाँ निरपेक्ष सत्य की अवधारणा पर आधारित हैं। अब्राहम से जुड़े इस्लाम , Christianity और Judaism सामान्यतः “एक पैगंबर, एक मार्ग और एक सत्य” की अवधारणा पर बल देते हैं। इसके विपरीत भारतीय दर्शन
“एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति” के माध्यम से सत्य की बहुलता को स्वीकार करता है। भारतीय दृष्टि “मैं ही सत्य हूँ” नहीं, बल्कि “मैं भी सत्य की एक अभिव्यक्ति हूँ” का भाव रखती है। यही कारण है कि भारत की संस्कृति आग्रह नहीं, बल्कि स्वीकार और समन्वय की संस्कृति है।
उन्होंने आगे कहा कि - भारतीय चिंतन “ईशावास्यमिदं सर्वम्” की भावना पर आधारित है, जहाँ सम्पूर्ण जगत में ईश्वर का वास माना गया है। यहाँ प्रकृति को मातृशक्ति और स्त्री को सृष्टि एवं ऊर्जा की मूल अभिव्यक्ति के रूप में सम्मान दिया गया। “अहं ब्रह्मास्मि”, “तत्त्वमसि” और “यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे” जैसे महावाक्य बताते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर वही चेतना विद्यमान है जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है।
इसी आध्यात्मिक दृष्टि से “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जैसी विश्वबंधुत्व की अवधारणाएँ विकसित हुईं। भारतीय संस्कृति का मूल भाव विभाजन नहीं, बल्कि समन्वय, सह-अस्तित्व और समरसता है। यही भारतीयता का सार है — विविधता में एकता और सम्पूर्ण सृष्टि के प्रति सम्मान।