इंदौर: जिला अभिभाषक संघ: 'कोषाध्यक्ष' की नियुक्ति पर छिड़ा घमासान, महिला सशक्तिकरण या व्यक्तिगत पसन्द ?

इंदौर: जिला अभिभाषक संघ: 'कोषाध्यक्ष' की नियुक्ति पर छिड़ा घमासान, महिला सशक्तिकरण या व्यक्तिगत पसन्द ?

इंदौर डेस्क

इंदौर-जिला अभिभाषक संघ में कोषाध्यक्ष पद पर हाल ही में हुई नियुक्ति ने एक नए कानूनी और प्रशासनिक विवाद को जन्म दे दिया है। जहाँ एक ओर संघ के पदाधिकारी इसे सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का पालन बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कार्यकारिणी के अन्य सदस्य व कई अधिवक्ता इसे "असंवैधानिक" और "चुनावी साजिश" बता रहे है।


आखिर क्या है पूरा मामला

दरअसल, 2 अप्रैल को इंदौर जिला अभिभाषक संघ ने कार्यकारिणी की महिला सदस्य नेहा रुहेला को कोषाध्यक्ष पद पर नियुक्त किया था। ( जबकि एडवोकेट पुरुषोत्तम सोमानी पहले से ही कोषाध्यक्ष के पद पर थे। )

अधिवक्ता संघ के पदाधिकारी ने इस नियुक्ति का आधार  माननीय सर्वोच्च न्यायालय (स्पेशल लीव पिटिशन: दीक्षा एवं अमृतेश वि. कर्नाटक राज्य) और मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के उन निर्देशों को बनाया गया, जिनमें अभिभाषक संघों में 30% महिला प्रतिनिधित्व और कोषाध्यक्ष पद महिला अभ्यर्थी के लिए आरक्षित करने की बात कही गई है।

लेकिन, इस नियुक्ति ने संघ के भीतर ही विरोध के स्वर मुखर कर दिए हैं। कार्यकारणी के कई अन्य सदस्य एवं कई अधिवक्ता इस नियुक्ति को असंवैधानिक एवं मनमाना बता रहे है।

माननीय न्यायालय के आदेश के परिपालन में की गई नियुक्ति - अधिवक्ता संघ अध्यक्ष
वहीं अधिवक्ता संघ अध्यक्ष एडवोकेट एल. एल. यादव इसे माननीय सुप्रीम कोर्ट एवं मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के परिपालन में की गई नियुक्ति बता रहे हैं। 

खैर, एसोसिएशन के अध्यक्ष कुछ भी कहे लेकिन कुछ मूल प्रश्न जरूर इस  नियुक्ति से खड़े हो रहे है. क्या इन प्रश्नों का जवाब कोषाध्यक्ष के पद पर व्यक्ति विशेष की नियुक्ति करने वाले पदाधिकारी दे पाएंगे ?

1.  प्रक्रिया का उल्लंघन: क्या अध्यक्ष/सचिव को सीधे किसी पद पर किसी की नियुक्ति का अधिकार है?
2.  चयन का आधार:  कार्यकारिणी की अन्य दो महिला सदस्यों एडवोकेट दीपाली बेरी व एडवोकेट नेहा रावत जैन को दरकिनार कर किसी एक नाम पर मुहर कैसे लगी? 
3.  आदेश की व्याख्या:  क्या वाकई कोर्ट का आदेश तत्काल नियुक्ति के लिए था या आगामी चुनावों के लिए?

ये वो सवाल है जो आज हर अधिवक्ता इस नियुक्ति को लेकर एसोसिएशन के जिम्मेदार पदाधिकारियों से पूछ रहा है।

माननीय सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालय का आदेश एवं निर्देश आगामी चुनाव को लेकर है - हाइकोर्ट बार एसोसिएशन  अध्यक्ष
उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एडवोकेट मनीष यादव से जब इस सम्बन्ध में चर्चा की गई तो उन्होंने बताया कि - माननीय सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालय का आदेश एवं निर्देश आगामी चुनाव को लेकर है ना कि त्वरित कोई नियुक्ति करने के लिए। हमने आगामी चुनाव के लिए महिलाओं के लिए 30% आरक्षण एवं कोषाध्यक्ष पद महिला अभ्यर्थी के लिए आरक्षित करने की व्यवस्था कर दी है।

बार एसोसिएशन का संचालन बायलॉज से होता है
यदि कानूनी दृष्टिकोण से देखें तो किसी भी बार एसोसिएशन का संचालन उसके बायलॉज अथवा संविधान के अनुसार होता है और आमतौर पर, पद की प्रकृति में बदलाव या आरक्षण लागू करने के लिए संघ के संविधान में संशोधन आवश्यक होता है, जो केवल साधारण सभा की बैठक में ही संभव है।

विश्वास में लिए बिना की नियुक्ति
दरअसल, एसोसिएशन के पदाधिकारियों द्वारा बिना किसी को विश्वास में लिए एवं कार्यकारिणी की अन्य दो महिला सदस्यों को दरकिनार कर किसी एक को अलोकतांत्रिक तरीके से नियुक्त कर देना पूरी तरह से गलत है। 
         (कार्यकारिणी की अन्य दो महिला सदस्य )
अब यह विवाद केवल एक पद की नियुक्ति का नहीं रह गया है, बल्कि इस बात का है कि न्याय के आदेशों को लागू करने का तरीका क्या हो?
यदि प्रक्रियाओं को दरकिनार कर नियुक्तियां की जाती हैं, तो वह 'महिला सशक्तिकरण' के बजाय 'व्यक्तिगत पसंद' का मामला बन जाता है।

यहां बड़ा सवाल यही है कि यदि कार्यकारिणी में तीन महिला सदस्य थीं , तो बिना किसी पारदर्शी प्रक्रिया या वोटिंग के किसी एक सदस्य को पद पर नियुक्त कर देना क्या बाकी दो महिला सदस्यों के अधिकारों का हनन नहीं है ? और क्या ये तरीका पदाधिकारियों की नीयत पर प्रश्नचिन्ह नहीं खड़े करता ?

भूल सुधार से कर देना चाहिए विवाद का अंत
खैर, एसोसिएशन के पदाधिकारियों को समय रहते अभी भी उनकी गलती सुधार कर इस विवाद का अंत कर देना चाहिए। नहीं तो इंदौर जिला अभिभाषक संघ का यह विवाद आने वाले समय में और गहरा हो सकता है साथ ही यह  जिम्मेदार पदाधिकारियों की साख पर हमेशा के लिए एक दाग की तरह रह जाएगा ।

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