रतलाम/सैलाना:आदिवासी अंचल में स्कूलों में दर्ज और परीक्षा में शामिल होने वाले बच्चों के बीच काफी अंतर, बेहतर रिजल्ट के बाद भी पूरी शिक्षण व्यवस्था की नाकामी है ये।
Saturday, March 28, 2026
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वीरेन्द्र त्रिवेदी, कैलाश परिहार
सैलाना-अनगिनत धन राशि खर्च हो, और अगर फिर भी आदिवासी अंचल में अंतिम व्यक्ति तक हम शिक्षा नहीं पहुंचा सके तो इसे कहीं ना कहीं व्यवस्था की असफलता या ये कहिए कि पूर्णरूपेण सफलता में संदेही कहा जाएगा। ऐसा आखिर क्यों होता हैं आदिवासी अंचल में कि सैकड़ों बच्चे प्रवेश लेते हैं और परीक्षा आते आते गायब हो जाते हैं।जागरूकता का अभाव,पलायन या जो भी कारण हो उन्हें खोज कर इस बात की पड़ताल बहुत ही जरूरी हैं कि जिनके लिए करोड़ों खर्च हो रहे हो उन तक पूरी ईमानदारी से शिक्षा पहुंचे। अंतिम बच्चा भी वार्षिक परीक्षा में शामिल हो।हालांकि कल घोषित आठवीं,पांचवीं के परीक्षा के सुकून दायक परिणाम निःसंदेह व्यवस्था के सुधार की ओर बढ़े कदम माने जाएंगे,पर अंचल में दर्ज और परीक्षा में सम्मिलित बच्चों के आंकड़े भी कोई कम चौंकाने वाले नहीं हैं।ये आंकड़े पूरी व्यवस्था में ओर सुधार की आवश्यकता पर बल देते नजर आ रहे हैं।
ये रहा,आंकड़ा
सैलाना ब्लॉक में पांचवीं में 3459 विद्यार्थियों में से 3080 ही परीक्षा केन्द्र तक पहुंचे।379 परीक्षा से दूर ही रहे। यानी इस आदिवासी ब्लॉक में इस कक्षा में 11 प्रतिशत विद्यार्थी परीक्षा में सम्मिलित नहीं हुए। आठवीं का आंकड़ा तो ओर चौंकाने वाला है। इस क्लास में पूरे सैलाना ब्लॉक से 18 प्रतिशत विद्यार्थियों ने परीक्षा केंद्रों से दूरी बनाई।2339 में से 1919 ने ही परीक्षा में शामिल होने में रुचि ली।420 अनुपस्थित रहे।
बाजना की स्थिति तो गोया इस मामले में ओर अधिक चिंताजनक हैं। इस ब्लॉक में पांचवीं में 12 प्रतिशत तो आठवीं में लगभग 20 प्रतिशत विद्यार्थियों ने सत्र की सबसे महत्वपूर्ण यानी वार्षिक परीक्षा में सम्मिलित होने में रुचि नहीं ली। इस ब्लॉक में पांचवीं में 3965 में से 3472 ही शामिल हुए।493 शामिल नहीं हुए। आठवीं में 2810 में से 2244 ही शामिल हुए।566 ने रुचि नहीं दिखाई।
क्यों बनती हैं ऐसी स्थिति
कल घोषित परिणाम के लिए संबंधित सभी भले ही खुद अपनी पीठ कितनी ही थपथपाए पर ये सवाल उठना भी लाज़मी हैं कि आखिर आदिवासी अंचल में शिक्षा को ले कर अभी भी जागृति नहीं हैं। शहरी,नगरीय,कस्बाई क्षेत्रों के स्कूलों में क्यों शत प्रतिशत दर्ज विद्यार्थी परीक्षा में शामिल होते हैं। निजी स्कूलों में भी वार्षिक परीक्षा में शामिल होने की संख्या काफी बेहतर होती हैं। सिर्फ अंचल में दर्ज और शामिल का अन्तर न केवल चिंताजनक है, बल्कि उस व्यवस्था पर भी सवालिया निशान लगाता हैं,जहां सब कुछ होने के बाद भी ये स्थिति क्यों पैदा हो रही हैं।जागरूकता का अभाव, काम की तलाश में माता पिता के पलायन, समय पूर्व बच्चों को मजदूरी पर लगा देना, आदि कारण इस समस्या के हो सकते हैं पर बेहतर वेतन पाने वाले शिक्षक क्या अंचल में अपनी जिम्मेदारी उसी बेहतर तरीके से निभा पा रहा हैं। ये देखना भी जरूरी हैं।
विशेषज्ञ का मत
अपने पूरे चार दशक के सेवाकाल के 36 साल आदिवासी क्षेत्र में सेवारत रहे सैलाना के शासकीय महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य डॉ प्रदीप सिंह राव आदिवासी अंचल के पिछड़ेपन पर रिसर्च कर चुके हैं। वे अंचल की शैक्षणिक स्थिति से अच्छी तरह से वाकिफ हैं। डॉक्टर राव कहते हैं कि आदिवासी अंचल की पूरी शैक्षणिक व्यवस्था सुधारने हेतु युद्ध स्तरीय अभियान की जरूरत हैं। अभी भी सरकारों के प्रयास के बावजूद जितनी जागृति होनी चाहिए वो है नहीं। काम की तलाश में पलायन भी इस स्थिति का कारण है। फिर भी इस बार का रिजल्ट काफी अच्छा रहा। पर निःसंदेह ओर सुधार की जरूरत हैं।
व्यवस्था पूरी तरह दोषपूर्ण
सैलाना विधायक कमलेश्वर डोडियार इस स्थिति पर अपनी बेबाक टिप्पणी देते हैं। वे कहते हैं कि शिक्षक सही से अपना काम करते ही नहीं। और अधिकारी उन्हें कुछ कहते ही नहीं। शिक्षकों की ओर पूरे सिस्टम का नाकामी है इतने बच्चों की वार्षिक परीक्षा से दूरी। स्कूल भवन जर्जर है।शिक्षक आते नहीं,अधिकारी देखते नहीं तो कहां से आएगी जागृति।
ये हैं जिम्मेदार का मत
आदिवासी विकास विभाग की सहायक आयुक्त रंजना सिंह इस समस्या पर कहती हैं कि दरअसल बच्चों के माता पिता का पलायन इसका बड़ा कारण हैं। शिक्षक अपना कर्तव्य पूरी ईमानदारी से निभाते हैं। अगले वर्ष ओर अधिक प्रयास किए जा कर दर्ज और परीक्षा में सम्मिलित का अन्तर कम किया जाएगा।